‘एंग्री यंग मैन’ वाला युग – 1970-80
इस अवधि में औद्योगिक बंबई में अपने पैर जमाने वाले युवाओं के इर्द-गिर्द फिल्म निर्माण और निर्देशन की आवश्यकता हावी थी ।
सफल फ़ॉर्मूला ‘रग्स टू रिचेस’ कहानियां बनाना था , जो लोगों को स्क्रीन पर अपने सपनों को जीने की अनुमति देगी।
इनमें से अधिकांश फिल्मों के लिए अमिताभ बच्चन पोस्टर बॉय बने और इसे ‘अमिताभ बच्चन का युग’ माना जा सकता है। उनकी सफल फिल्मों में जंजीर, अग्निपथ, अमर अकबर और एंथोनी आदि शामिल हैं।
एक और फिल्म जिसका विशेष उल्लेख जरूरी है वह क्लासिक शोले है जो 70 मिमी पैमाने पर बनी पहली फिल्म थी । इसने सभी मौजूदा रिकॉर्ड तोड़ दिए और 1990 के दशक तक सिनेमाघरों में सबसे लंबे समय तक चलने वाली फिल्म थी।
रोमांटिक सिनेमा का दौर – 1980-2000
1980 के बाद से भारतीय सिनेमा का चेहरा तेजी से बदला। सामाजिक मुद्दों पर फिल्मों की बाढ़ आ गई। रोमांटिक फिल्मों और पारिवारिक ड्रामा को भी बड़ी संख्या में दर्शक मिल रहे थे।
इस दौर के तीन प्रमुख अभिनेता थे अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ और गोविंदा। उन्होंने तेजाब, राम लखन, फूल और कांटे, हम आदि जैसी सफल ब्लॉकबस्टर फिल्मों में अभिनय किया।
80 के दशक के उत्तरार्ध में बाजीगर और डर जैसी फिल्मों के माध्यम से ‘एंटी-हीरो’ छवि का उदय हुआ , जिसने खान तिकड़ी के स्टारडम को लॉन्च किया।
1990 के दशक में एलपीजी ने उन्नत प्रौद्योगिकी को भारत में आने की अनुमति दी। उदाहरण के लिए, माई डियर कुट्टीचटन भारत की पहली 3डी फिल्म थी जो मलयालम में बनी थी ।
भारतीय दर्शकों को एक और प्रमुख तकनीक – डॉल्बी साउंड सिस्टम से परिचित कराया गया।
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